Friday, July 19, 2019

पहली बार स्कूल जा रहे एक बच्चे की मां का खत उसके प्रिंसिपल के नाम


आदरणीय महोदया,

आज मैं अपने बच्चे को बहुत डर, संशय, घबराहट, लेकिन कुछ उम्मीदों के साथ आपके पास भेज रही हूं. इनमें से कुछ मैं आपके साथ बांट रही हूं. इस खत की अधिकांश बातें आपको अजीब लगेंगी, लेकिन फिर भी आप एक बार उन पर ध्यान दें तो मैं आपकी आभारी रहूंगी.

अपनी जिंदगी के कीमती 14 साल मेरा बच्चा आपके संस्थान में बिताने वाला है. मैं एक छः साल का मुलायम-सा, मासूम बच्चा आपके पास भेज रही हूं. लेकिन, जब वह आपके संस्थान से बाहर आएगा, वह मूंछ-दाढ़ी वाला एक बालिग लड़का होगा, जिसकी आवाज तक बदल चुकी होगी. आप समझ सकती हैं, यह बहुत लंबा और बेहद कीमती समय है. इतने लंबे समय में आप बिना किसी हड़बड़ी के उसे इन तमाम चीजों के बारे में बहुत व्यवस्थित तरीके से बता सकते हैं, बशर्त कि आप बताना चाहें.

रोज शाम को घूमते हुए जब मैं अपने बच्चे को पढ़ाई का कुछ रटवा रही होती हूं, तो वह तंग होकर कहता है - ‘ओहो मम्मा, क्यों बार-बार बोलते जा रहे हो ये...अब और नहीं बोलना!’ यह सच है कि मैं भी उसे कम से कम इतनी छोटी उम्र में तो ये नहीं ही करवाना चाहती...पर, फिर भी मैं ऐसा कर रही हूं, क्योंकि मैं जानती हूं कि उसे कुछ समय बाद स्कूल जाना है और कक्षा में सबसे आगे होकर अपने परिवार वालों की इच्छा को पूरा करना है. पर असल में मैं शर्मिंदा हूं कि मैं उसके कच्चे दिमाग को अभी से, इस तरह से और उन चीजों से भर रही हूं, जो कि अभी उसकी जरूरत ही नहीं है. स्कूल न जाते हुए भी वह स्कूल के हिसाब से ही अपनी पढ़ाई का रूटीन पूरा करता है. ताकि एक दिन जब वह स्कूल जाने लगे तो अचानक उसे यह न लगे कि वह कहां फंस गया है.

अक्सर देखती हूं कि जरा-जरा से बच्चों को पहाड़े रटाए जाते हैं. मैं जानती हूं कि पहाड़े जिंदगी भर हिसाब-किताब लगाने में बहुत काम आते हैं. लेकिन जिस उम्र में उन्हें पहाड़े रटाये जाते हैं, उस उम्र में वे हिसाब-किताब से कोसों दूर होते हैं. और जब उन्हें हिसाब-किताब करना होता है, तब तक वे अक्सर पहाड़ों को भूल चुके होते हैं!

मेरा कहने का मतलब सिर्फ इतना है कि बच्चों पर कम उम्र में ज्यादा भार न डाला जाए. उनके दिमाग में पहले ऐसी चीजों को डाला जाए, जो उन्हें रटना नहीं है और जो जिंदगी भर उनके काम आएंगी... जैसे लड़की-लड़कों को परस्पर सहयोग करना सिखाया जाए. उन्हें बताया जाए कि उन्हें जिंदगी भर ऐसे ही सहयोगी बने रहना है, चाहे वे किसी भी रिश्ते में हों. यह बात जिंदगी भर न सिर्फ उनके काम आएगी, बल्कि वे अच्छे भाई-बहन, दोस्त, प्रेमी-प्रेमिका, पति-पत्नी और अच्छे माता-पिता बन सकेंगे. इससे एक स्वस्थ समाज की नींव पड़ेगी. उन्हें कंप्यूटर का ज्ञान दिया जाए, लेकिन साथ ही वे चीजें भी सिखाई जाएं, जो कि कंप्यूटर और मोबाइल उन्हें नहीं सिखा सकते. बच्चों को एक-दूसरे का विश्वासपात्र बनना सिखाया जाए, उन्हें अपने वायदे को हर हाल में पूरा करना सिखाया जाए, बुजुर्गो की मदद करना सिखाए जाए. उन्हें सिखाया जाए कि किन्नरों, प्राकृतिक रूप से अपंग और खुद से अलग तरह के लोगों का कभी भी मजाक नहीं उड़ाना चाहिए.

आप मेरे बच्चे को ‘सदा सच बोलो’ की बजाय ‘सदा सच सुनो और स्वीकार करो’ सिखाएं. आप जानती हैं कि हर कोई बचपन में ‘सदा सच बोलो’ ही सीखता आया है, लेकिन फिर भी समाज में झूठ का ही चलन बढ़ रहा है! आमतौर पर कोई सच नहीं बोलता. वह इसलिए कि सच सुनना और बर्दाश्त करना किसी को नहीं आता. सच सुनकर हम सब अक्सर बौखला जाते हैं. फिर कोई सच बोलकर आफत मोल क्यूं ले भला? यह ठीक है कि आज मेरे बच्चे को सिर्फ सच बोलने के रोल में ही रहना है, न कि सच को सुनकर बर्दाश्त करने के. लेकिन, कल को जब वह बड़ा होगा, तो उसे भी आने वाली पीढ़ी के सच को सुनने और सहन करने की आदत होनी चाहिए. यह आदत अभी से डाली जानी चाहिए, क्योंकि बच्चों को स्कूल में पढ़ाने का मतलब भविष्य के लिए तैयार करना भी है....क्या आप मेरी बात से सहमत हैं? क्या आप ऐसा कर सकेंगी?

आप मेरे बेटे को बताएं कि सिर्फ लड़का होने के कारण वह बहुत अहम या खास नहीं हो गया है. आफ उसके जैसे लड़कों को समझाएं कि लड़के ज्यादा खास तब बन सकते हैं, जब वे घर के भीतर और बाहर हमेशा, हर तरह के काम करने को खुशी-खुशी तैयार रहते हैं. खासतौर से उन्हें बताया जाए कि उन्हें अपनी मांओं से सीखना चाहिए कि कैसे वे ऑफिस और घर के कामों को एक साथ निबटाते हुए हर जगह अपना 100 प्रतिशत देकर खुश रहने को लालायित रहती हैं....साथ ही सिर्फ घर का काम संभालने वाली मांओं के अंतहीन श्रम के बारे में भी उन्हें बताया जाए और उसका सम्मान करना सिखाया जाए. उन्हें बताया जाए कि वे कभी भी अपनी घरेलू मां का परिचय ‘मेरी मां कुछ नहीं करती’ कहकर नहीं दें.

मैं चाहूंगी कि आप मेरे बेटे को, बल्कि स्कूल में आने वाले तमाम बेटों को सबसे पहले लड़कियों का असम्मान नहीं करना है, यह सिखाएं, लड़कियों को जिंदा इंसान समझना सिखाएं. हो सकता है इससे ज्यादा जरूरी कुछ और चीजें भी हों, लेकिन इस चीज को भी उतना ही जरूरी समझा जाए. बल्कि मैं समझती हूं कि ये बात अन्य तमाम जरूरी बातों से भी कहीं ज्यादा जरूरी है, क्योंकि इससे पूरे समाज की आधी आबादी के बेहद गंभीर सवाल जुड़े हुए हैं.

मेरे बेटे को सही निर्णय लेने के अभ्यास कराए जायें ताकि वह जिंदगी में सही समय पर सही निर्णय ले सके. खासतौर से लड़कियों को निर्णय लेना सिखाया जाए, क्योंकि उनके खून में दूसरों के निर्णय सुनने और मानने के जींस ज्यादा होते हैं. निर्णय लेने की बात आते ही वे विचलित न हों, उनमें इतना आत्मविश्वास भरिए... आप बच्चों के यह भी बताएं कि लड़कों के निर्णय ज्यादा अहम हैं और लड़कियों के निर्णय कम अहम यह बेहद गलत अवधारणा है! या फिर लड़कों के निर्णय अक्सर सही और लड़कियों के निर्णय अक्सर गलत होते हैं, यह बिलकुल गलत सोच है.

ठीक इसी समय आपको छोटी बच्चियों को यह भी बताना चाहिए कि वे सिर्फ लड़की होने के कारण हीन या लड़कों से कम महत्वपूर्ण नहीं हैं. आपको लड़कियों के भीतर जन्मजात होने वाले अपराधबोध को कम और फिर खत्म करने में मदद करनी चाहिए. उन्हें बताना चाहिए कि हर एक गलती के लिए खुद को जिम्मेदार ठहराना बेहद गलत और नकारात्मक सोच है, जो उनकी ऊर्जा को कम करती है!
बच्चों से शारीरिक श्रम जरूर करवाइये. ऐसा इसलिए, क्योंकि मैं देख रही हूं कि हर आने वाली पीढ़ी पिछली पीढ़ी की अपेक्षा शरीरिक रूप से काफी कमजोर है. वे पुरानी पीढ़ी से जल्दी थकते हैं, कम वजन उठा पाते हैं. कुल मिलाकर उन्हें सिखाया जाए कि स्वस्थ और ताकतवर बनने के लिए मेहनत करना कितना जरूरी है. आप बड़ी आसानी से यह नजारा हर सुबह कहीं भी देख सकते हैं कि बच्चे अपने स्कूल बैग तक का वजन नहीं उठाते. बच्चों की माएं अक्सर स्कूल बैग कंधों पर ढोती हैं. माएं नहीं जानती कि ऐसा करके वे असल में अपने बच्चों को कमजोर बना रही हैं.

एक और सबसे जरूरी चीज है, कि उन्हें अहसानमंद होना सिखाया जाए. न सिर्फ अपने मां-बाप के प्रति, बल्कि इस प्रकृति और इस समाज के प्रति, जिसके कारण वे जिंदा हैं. बच्चों को बताया जाए कि वे सिर्फ इसलिए ही नहीं एक अच्छा जीवन जी पा रहे हैं, कि उनके माता-पिता के पास हर तरह की सुविधा जुटाने के लिए बहुत सारे पैसे हैं. बल्कि वे इसलिए अच्छा जीवन जी रहें हैं कि उनकी हर एक सुविधा, जरूरत, आराम और खुशी के लिए दुनिया में असंख्य लोग दिन-रात काम में लगे हैं. आप मेरे और स्कूल के तमाम बच्चों को उन असंख्य, अनदेखे लोगों के प्रति अहसानमंद होना सिखाएं जो कि दिन-रात, जीवन भर, उनके आराम के लिए पता नहीं कब से खट रहे हैं और खटते रहेंगे!

मैं चाहती हूं कि आप मेरे बच्चे को यह जरूर बताएं कि जीवन की पहली जरूरत, यानी खाना, कैसे जुटाया जाता है. उसे पता होना चाहिए कि उसकी तीन वक्त की भूख के लिए कौन लोग, कैसे अपना जीवन खत्म करते हैं. मेरे बेटे को अहसास होना चाहिए कि वह इसलिए अच्छा खाना खा रहा है कि असंख्य किसान जलाने वाली धूप में खेतों में दिन-रात उसकी भूख के लिए अपनी कमर तोड़ रहे हैं...और मजदूर बंद कमरों में खुद को खपा रहे हैं.

क्या आप मेरे बेटे को सिखा सकेंगे कि जीतना अच्छा है, लेकिन हारना भी बुरा नहीं है? कक्षा में पहले, दूसरे, तीसरे नंबर पर आना अच्छा है, लेकिन कक्षा में पीछे रहना भी बुरा नहीं है. सबसे ज्यादा बुरा है कि उसके भीतर अच्छा इंसान बनने की ललक पैदा न होना! आप उसे बताएं कि इस दुनिया में डॉक्टर, प्रबंधक, इंजीनियर, वकील, आईएएस, उद्योगपति, व्यापारी बनना मुश्किल है. लेकिन इन सबसे कहीं ज्यादा मुश्किल है ‘अच्छा इंसान’ बनना और बने रहना! किसी पेशेवर से पहले आप उसमें ‘अच्छा इंसान’ बनने की ललक पैदा करें.

इस बात से आप इनकार नहीं कर सकते कि समाज में पढ़े-लिखे पेशेवरों की इतनी बड़ी फ़ौज के बावजूद पूरा विश्व् एक स्वस्थ समाज नहीं बन पा रहा है. यह सिर्फ इसलिए कि हम घरों, स्कूलों और कॉलेज के बच्चों को सिर्फ ‘अच्छा प्रोफशनल’ बनने की सीख देते हैं. हम अच्छा इंसान बनने की जरूरत को एक प्रतिशत भी एड्रेस नहीं करते. आज स्वस्थ, शांत और सुखी समाज की पहली जरूरत ‘अच्छे इंसान’ हैं, ‘अच्छे प्रोफेश्नल’ नहीं.

आप मेरे बेटे को जाति, धर्म, रंग, नस्ल के भेद से परे सबसे प्यार करना सिखाएं. मैं चाहती हूं कि मेरे बच्चे और तमाम बच्चों को सिर्फ अपने घर के लोगों का सम्मान और प्यार करना न सिखाया जाए...उन्हें अपने खून, जाति, धर्म, हैसियत के हिसाब से प्यार करना न सिखाया जाए. उन्हें अपने बड़ों का सम्मान करना जरूर सिखाया जाए, पर साथ ही यह भी बताया जाए कि बड़े होने के साथ सुपात्र होना भी जरूरी है. यदि कोई बड़ा बेहद गलत काम कर रहा है, तो वह सम्मान का नहीं बल्कि उपेक्षा का पात्र है. आप उसे अपनों की गलतियों को स्वीकार करना और दूसरों की खूबियों का सम्मान करना एक साथ सिखाएं.

बच्चों को बताया जाए कि सिर्फ अपने परिवार की खुशहाली के कारण कोई भी इंसान खुश नहीं रह सकता. उन्हें बताया जाए कि यदि हम दूसरों के अभाव, दुख, तंगी, तकलीफों तक नहीं पहुंचेंगे, तो वही दुख, संत्रास, अभाव इकठ्ठे होकर स्वयं उनके पास तक पहुंचेंगे और वह भी बेहद बुरे और भयानक तरीके से! इसका मतलब है कि अपने आस-पड़ोस की चीजों को अनदेखा करके नहीं जीना चाहिए.

मैं चाहूंगी कि कभी-कभी आप उसे बैंच, क्लास, चॉक, असाइनमेंट होमवर्क, टेस्ट और इवेल्युऐशन की दुनिया से बहुत दूर ले जाएं... आप उसे नदी, पहाड़, समुद्र, जंगल के पास ले जाएं...उसे बताएं कि असल में उसके जीवन में इन प्राकृतिक चीजों की भूमिका उसके माता-पिता से भी ज्यादा है! उसे समझ में आना चाहिए कि वह अपने मां-बाप के बिना तो फिर भी जीवित रह सकता है, पर इन चीजों के बिना उसका जीवन असंभव है! उसे पता होना चाहिए कि पहली बारिश की खुशबू से एक इत्र पैदा होता है.

मेरे बच्चे और स्कूल के तमाम बच्चों, बल्कि मैं तो कहूंगी कि दुनिया के तमाम बच्चों को, उनकी उम्र और दिमाग के हिसाब से इन बड़े इम्तिहानों के लिए भी तैयार किया जाए. ऐसा न हो कि स्कूल के इम्तिहानों में उन्हें इतना उलझा दिया जाए, कि असल जिंदगी के इम्तिहानों से जूझने की उनमें समझ और अक्ल ही न बचे! उनके दिमाग को इस कदर तेज और रचनात्मक बनाने की हरसंभव कोशिश की जाए कि वे इन बड़ी उलझनों को सुलझाने में सफल हो सकें. ये उनकी जिंदगी की वैसी ही चुनौतियां हैं, जैसी कि पढ़-लिखकर एक अच्छी सी नौकरी पा लेने की चुनौती होती हैं. बल्कि सच तो यह है कि इन भयंकर जटिल इम्तिहानों को पास करना, अच्छी नौकरी और अच्छा पैकेज पाने से कहीं ज्यादा चुनौती भरा है!
यदि ऐसा हुआ, तो आप भी उसके एक अच्छा इंसान बनाने की संभावना को खत्म करने के लिए बराबर के जिम्मेदार होंगे! आप एक स्वस्थ समाज की नींव डालने में अपने योगदान को न निभाने के दोषी होंगे! आपको अंदाजा भी नहीं कि आप किन-किन चीजों के गुनहगार होंगे...कृपया आप खुद भी गुनहगार होने से बचें और दूसरे मां-पिताओं को भी इस पाप से बचाएं.

जैसे वह अपने मां-बाप, भाई-बहन और दोस्तों के प्रति अपना प्यार जताता है, वैसे ही उसे प्रकृति की इन चीजों से भी प्यार करना आना चाहिए. जंगल में लगी आग पर उसे ऐसे ही दुख महसूस होना चाहिए, जैसे किसी अपने के मरने पर होता है. नदियों के गंदे पानी को देखकर उसे ऐसे ही तकलीफ होनी चाहिए जैसे अपने किसी प्रियजन को बेहद बीमार देखकर होती है. उसे सिर्फ तकलीफ जताना ही नहीं आना चाहिए, बल्कि उसका हल खोजने की कूवत आप उसमें पैदा करें.

मैं बहुत चुनौती भरे समय में अपने बच्चे को आपके पास भेज रही हूं. उसके सामने किताबों के कोर्स को घोलकर पी जाने और बेहद अच्छे नंबर या ग्रेड लाने से कहीं ज्यादा बड़ी चुनौतियां हैं. क्योंकि सबसे अच्छे नंबर लाने वाले या सबसे अच्छा ग्रेड पाने वाले बच्चे और सबसे ज्यादा पैकेज पाने वाले युवा भी इस समाज और दुनिया की चुनौतियों से वैसे ही जूझते हैं, जैसे कि कोई औसत नंबर पाने वाला बच्चा!
बढ़ती शिक्षा के साथ बढ़ती असहिष्णुता, असंवेदनशीलता, सांप्रदायिकता, स्त्रियों के प्रति हिंसा, यौन हिंसा, संहारक हथियारों की बढ़ती संख्या, हवा, पानी, मिट्टी का बढ़ता प्रदूषण, कटते जंगल, मौसम की बढ़ती अनिश्चित्ता, बेतहाशा बढ़ती प्राकृतिक आपदाएं, भूखे-प्यासे लोगों की बढ़ती संख्या, मुठ्ठी भर लोगों की बेलगाम इच्छाओं और चाहतों के लिए असंख्य लोगों को बुनियादी सुविधाओं से भी वंचित कर देना, उन्हें कुचलना आदि कुछ ऐसे मसले हैं, जिनसे आज के बच्चों को जूझना है. असल में यही जीवन के असली इम्तिहान हैं, लेकिन इनमें पास होने के लिए कहीं कोई तैयारी नहीं चल रही! मुझे बेहद दुख और अफसोस है कि दुनिया के किसी हिस्से में ऐसा कोई स्कूल मेरी जानकारी में नहीं चल रहा, जहां इन असली इम्तिहानों को पास कराने की तैयारी बच्चों को जोर-शोर से कराई जा रही हो!

बच्चों को समय रहते अपनी गलतियों के लिए दिल से माफी मांगने का सलीका भी आना चाहिए और माफ करने का शऊर भी. न सिर्फ मेरे बेटे को, बल्कि सारे बच्चों को एक साथ पत्थर की तरह मजबूत, अडिग और पानी की तरह गतिवान बनना भी सिखाइये...उनमें इतनी समझ पैदा करने की कोशिश करें, कि वे समझ सकें कि उन्हें कब पानी की तरह मुलायम बनना है और कब पत्थर की तरह कठोर?
आप मेरे बच्चे को हमेशा चेहरे पर बनावटी मुस्कुराहट चिपकाए रखने की बजाए, बुक्का फाड़कर हंसना सिखाएं. बल्कि उसे कहें कि कभी-कभी बुक्का फाड़कर रोना भी अदभुत होता है. आप उसे बताएं कि रोना सिर्फ लड़कियों का काम नहीं है! रोना मन शांत करने की एक बेहद सहज प्रक्रिया है, जो कि सच में बेहद कारगर होती है अक्सर. उसे समझाएं कि रोना कमजोर होने की निशानी कतई नहीं है और सबके सामने रोने में कोई शर्म की बात नहीं है.

मैं जानती हूं कि स्कूल कोई जादुई छड़ी नहीं है. बच्चे को ये तमाम चीजें स्कूल के साथ घर में भी सिखाई, बताई जायेंगी, तभी वह इन सबके बारे में सोचेगा. मेरा आपसे वादा है कि मैं इस खत में लिखी ज्यादातर चीजें अपने बेटे को बताने की हरसंभव कोशिश करूंगी. लेकिन मुझे डर है कि यदि आप उसे अपने उसी पुराने ढर्रे पर ले जाएंगे (यानी रटने, होमवर्क के ढेर, परीक्षाओं के अंबार, ऐसे असाइनमेंट जो कि वह खुद नहीं कर सकेगा, बल्कि उसके मां-बाप करेंगे), तो फिर मैं भी उसे सिर्फ इसी ‘बाधा-दौड़’ को जिताने में ही लगी रहूंगी, और उसे ये सब कभी नहीं सिखा पाऊंगी.

एक अजनबी ऑटोवाले की बात से मै अपना खत ख़त्म करती हूं. उसने कहा था -‘इस दुनिया में जो पैदा हुआ है, वह हरेक इंसान कमाना और पेट भरना जानता है. लेकिन दुआ लेना हर कोई नहीं जानता.’ मैं चाहती हूं कि आप मेरे बच्चे को और स्कूल के तमाम बच्चों को दुआ लेने की कला सिखाएं.
सादर,
एक मां

Father Forgets



डबल्यू लिविंगस्टन लारनेड यह पत्र हर पिता को पढ़ना चाहिए- हर माँ को भी...

सुनो बेटे ! मैं तुमसे कुछ कहना चाहता हूं । तुम गहरी नींद में सो रहे हो । तुम्हारा नन्हा सा हाथ तुम्हारे नाजुक गाल के नीचे दबा है और तुम्हारे पसीना-पसीना ललाट पर घुंघराले बाल बिखरे हुए हैं । मैं तुम्हारे कमरे में चुपके से दाखिल हुआ हूं , अकेला । अभी कुछ मिनट पहले जब मैं लाइब्रेरी में अखबार पढ़ रहा था, तो मुझे बहुत पश्चाताप हुआ । इसीलिए तो आधी रात को मैं तुम्हारे पास खड़ा हूं किसी अपराधी की तरह ।

जिन बातों के बारे में मैं सोच रहा था , वे ये है बेटे । मैं आज तुम पर बहुत नाराज हुआ । जब तुम स्कूल जाने के लिए तैयार हो रहे थे , तब मैंने तुम्हें खूब डांटा ... तुमने टोवेल के बजाए पर्दे से हाथ पोंछ लिए थे । तुम्हारे जूते गंदे थे इस बात पर भी मैंने तुम्हें कोसा । तुमने फर्श पर इधर-उधर चीजें फेंक रखी थी .. इस पर मैंने तुम्हें भला बुरा कहा । नाश्ता करते वक्त भी मैं तुम्हारी एक के बाद एक गलतियां निकालता रहा । तुमने डाइनिंग टेबल पर खाना बिखरा दिया था खाते समय तुम्हारे मुंह से चपड़ चपड़ की आवाज़ आ रही थी । मेज पर तुमने कोहनियां भी टिका रखी थी । तुमने ब्रेड पर बहुत सारा मक्खन भी चुपड़ लिया था । यही नहीं जब मैं ऑफिस जा रहा था और तुम खेलने जा रहे थे और तुमने मुड़कर हाथ हिलाकर बाय-बाय डैडी कहा था , तब भी मैंने भृकुटी तान कर टोका था । अपना कॉलर ठीक करो ।

शाम को भी मैंने यही सब किया । ऑफिस से लौटकर मैंने देखा कि तुम दोस्तों के साथ मिट्टी में खेल रहे थे , तुम्हारे कपड़े गंदे थे , तुम्हारे मोजों में छेद हो गए थे । मैं तुम्हें पकड़कर ले गया और तुम्हारे दोस्तों के सामने तुम्हें अपमानित किया । मोजे महंगे हैं -- जब तुम्हें खरीदने पड़ेंगे तब तुम्हें इनकी कीमत समझ में आएगी । जरा सोचो तो सही , एक पिता अपने बेटे का इस से ज्यादा दिल किस तरह दुखा सकता है ?

क्या तुम्हें याद है जब मैं लाइब्रेरी में पढ़ रहा था तब तुम रात को मेरे कमरे में आए थे । किसी सहमे हुए मृगछौने की तरह । तुम्हारी आंखें बता रही थीं कि तुम्हें कितनी चोट पहुंची है । और मैंने अखबार के ऊपर से देखते हुए पढ़ने में बाधा डालने के लिए तुम्हें झिड़क दिया था । " कभी तो चैन से रहने दिया करो अब क्या बात है ? " और तुम दरवाजे पर ही ठिठक गए थे । तुमने कुछ नहीं कहा था बस भागकर मेरे गले में अपनी बाहें डाल कर मुझे चूमा था और गुड नाइट कहकर चले गए थे । तुम्हारी नन्ही बाहों की जकड़न बता रही थी कि तुम्हारे दिल में ईश्वर ने प्रेम का ऐसा फूल खिलाया है जो इतनी उपेक्षा के बाद भी नहीं मुरझाया । और फिर तुम सीढ़ियों पर खटखट करके चढ़ गए । 

तो बेटे , इस घटना के कुछ ही देर बाद मेरे हाथों से अखबार छूट गया और मुझे बहुत ग्लानि हुई । यह क्या होता जा रहा है मुझे ? गलतियां ढूंढने की डांटने -डपटने की आदत सी पड़ती जा रही है मुझे । अपने बच्चे के बचपन का मैं यह पुरस्कार दे रहा हूं ? ऐसा नहीं है बेटे कि मैं तुम्हें प्यार नहीं करता , पर मैं एक बच्चे से जरूरत से ज्यादा उम्मीदें लगा बैठा था । मैं तुम्हारे व्यवहार को अपनी उम्र के तराजू पर तौल रहा था ।

तुम इतने प्यारे हो , इतने अच्छे और सच्चे । तुम्हारा नन्हा सा दिल इतना बड़ा है जैसे चौड़ी पहाड़ियों के पीछे से उगती सुबह । तुम्हारा बड़प्पन इसी बात से नजर आता है कि दिनभर डांटते रहने वाले पापा को भी तुम रात को गुड नाईट किस देने आए । आज की रात और कुछ भी महत्वपूर्ण नहीं है , बेटे । मैं अंधेरे में तुम्हारे सिरहाने आया हूं और मैं यहां पर घुटने टिकाए बैठा हूं , शर्मिंदा ।

यह एक कमजोर पश्चाताप है । मैं जानता हूं कि अगर मैं तुम्हें जगा कर यह सब कहूंगा , तो शायद तुम नहीं समझ पाओगे । पर कल से मैं सचमुच तुम्हारा प्यारा पापा बन कर दिखाऊंगा । मैं तुम्हारे साथ खेलूंगा , तुम्हारी मजेदार बातें मन लगाकर सुनूंगा , तुम्हारे साथ खुलकर हँसूँगा और तुम्हारी तकलीफों को बांटूंगा । आगे से जब भी मैं तुम्हें डांटने के लिए मुंह खोलूंगा , तो इससे पहले अपनी जीभ को अपने दांतों में दबा लूंगा ।मैं बार-बार किसी मंत्र की तरह यह कहना सीखूंगा , " वह तो अभी बच्चा है .... छोटा सा बच्चा ।"

मुझे अफसोस है कि मैंने तुम्हें बच्चा नहीं ,बड़ा मान लिया था ।परंतु आज जब मैं तुम्हें गुड़ी मुड़ी और थका-थका पलंग पर सोया देख रहा हूं बेटे , तो मुझे एहसास होता है तुम अभी बच्चे ही तो हो । कल तक तुम अपनी मां की बाहों में थे उसके कंधे पर सिर रखे । मैंने तुमसे कितनी ज्यादा उम्मीदें की थी कितनी ज्यादा...

- डबल्यू लिविंगस्टन लारनेड

Wednesday, May 15, 2019

Relation between happiness and learning outcome


एक बार सोच के देखिये आप की कक्षा में कितने बच्चे हैँ जिनके चेहरे से मुस्कान बहुत दूर दूर रहती है बहुत अलग -अलग रहते हैँ वे, सहमे से, गुमसुम से, खोये-खोये. ऐसी स्थिति में उनका काम ना पूरा होने पे, याद ना होने पे, गलत व्यवहार करने पे उन्हें डांट देना, पीट देना, सजा देना बहुत आम सी बात होती है.और ऐसे बच्चे हमारी कक्षाओं में अधिक होते हैँ क्यूँ की वह जिस परिवेश से आते हैँ वहां परिस्थितियां बहुत कठिन हैं.सबसे महत्वपूर्ण चीज है की बच्चे खुश रहें, मुस्कुराते रहें मानसिक तनाव से दूर रहें.

प्रश्न : लेकिन किसकी जिम्मेदारी है उन्हें खुश रखने की ?
उत्तर : परिवार की ?

प्रश्न : परिवार में है कौन इस जिम्मेदारी को निभाने वाला ? 
पिता ? पिता दिन भर मजदूरी करता है, या तो बाहर कमाता है, नहीं तो दारु पीता है और घर आ कर मार पीट करता है, या फिर इस दुनिया में है ही नहीं.

माँ ? माँ दिन भर घर, गोरु और खेत के काम में व्यस्त है, साँझ होते ही घर के झगडे कभी खाने पे कभी किसी और बात पे, मार पीट खाने के बाद रो धो के दीपक बुझा के बच्चों को भी डाट के सुला देती है.

भाई ? भाई बड़े हैँ तो वो भी दो वक़्त की रोटी जोड़ने में बहुत छोटी उम्र से जुटे हैँ, किसी किसी को तो छोटी उम्र में बड़ों के साथ काम करने के कारण तम्बाकू, सिगरेट और नशे की लत भी है.

बहन ? बहन बड़ी है तो ससुराल की ही गई होगी, शादी नहीं हुई तो घर में उसकी शादी ही कलेश का कारण होगी, या फिर ससुराल से किसी कारणवश मायके बिठा दी गई होगी. 

दादा - दादी ? दादा -दादी हैं भी तो 
पने उम्र और रोगों के कारण स्वयं त्रस्त हैँ.

प्रश्न : अब बचा कौन जो इन बच्चों की खुशियों का इनकी प्यारी सी मुस्कान का ध्यान रखे ?
उत्तर : वही जो उनसे रोज़ मिलता/मिलती हो, जिसके संग यह बच्चे 5-6 घण्टे रोज़ बिताते हैँ, जिस पर बहुत विश्वास करके यह गरीब परिवार 
पने बच्चों को भेजते हैँ. जिसे गुरु, सर जी, मैम जी नाम से पुकारते हैं यह नन्हे बच्चे. 

प्रश्न : क्यूँ जरुरी है बच्चों का खुश होना मुस्कुराते रहना ?
उत्तर : ऐसे परिवेश से आने वाले यह बच्चे मानसिक रूप से इतने दुखी होते 
हैं की आप चाहें कितने भी तरीके अपना ले वो learning outcome नहीं अचीव कर पाएंगे जो हो जाने चाहिए. आपकी टीचिंग स्ट्रेटेजी, कंटेंट नॉलेज, ढेर सारे TLM सब बेकार लगेगा आपको जब इतनी मेहनत के बाद भी वो परिणाम नहीं मिलेंगे जिनकी आपने कल्पना की है. क्यूँ की जब आप पढ़ा रहे होते हैँ तब वो मन ही मन एक अलग लड़ाई लड़ रहे होते हैँ उन झंझावतों से निकलने की, उसे याद आ रहा होता है वो सब जो पिछली रात उसके घर हुआ था, कभी गुस्सा आ रहा होता है उसे, कभी दया अपनी माँ पर, कभी प्यार गोद वाले रोते चीखते छोटे भाई पर. कभी पेट से भूख की आवाज़ आ रही होती है. इन सब में उलझा हुआ वो पूरा घंटा कब निकल गया उसे पता ही नहीं चलता उसने तो सुना ही नहीं जो आपने कहा, उसे वो दिखा ही नहीं जो आपने लिखा. इसी बीच आप उसे खड़ा कर के प्रश्न पूछ लें और जवाब ना आने पर डांट -पिटाई लगा दें क्या होगा ऐसी स्थिति में उस बाल मन का. स्कूल से भागेगा वो, उपस्थिति घटेगी, धीरे धीरे पढ़ाई और स्कूल से मन छूट जायेगा. एक अच्छा शिक्षक बनना इतना आसान नहीं है खास कर जब आप 4-14 वर्ष के बच्चों के साथ ग्रामीण परिवेश में कार्य कर रहे हों जहाँ दो वक़्त की रोटी जोड़ना ही बहुत बड़ी जुगत है. 

सबसे पहली शर्त है की हम 
बाल मन में अपनी जगह बना पाएं, जब तक बच्चे भावनात्म रूप से आप से जुड़े नहीं होंगे आप चाह कर भी उनमे वो परिवर्तन नहीं ला सकते जो लाना चाहते हैँ. जब आपकी कक्षा में पढ़ने वाला हर बच्चा मुस्कुराने लगे,  आपसे खुल के चहचहाने लगे. आपको जब यह पता हो को उसके घर आज कौन आया है, उसकी माँ क्यूँ बीमार है, घर में आज क्या बना है, खेत पर कौन जाता है उसे राशन लेने किस दिन जाना है, कल उसे किसने पीटा है, सुबह उसने क्या खाया, कल किस नातेदार के यहाँ शादी में जाना है. समझ लीजिये आप ने बांध लिया उसे अपने साथ, उसका मन हल्का हो जायेगा सब दुख कहने से अपने. अब वो मुस्कुरायेगा, खेलेगा और पढ़ेगा भी, स्कूल रोज़ इसलिए भी आएगा की उसे कोई सुनता है यहाँ.

हमारे पास हल नहीं है उनके दुखों का किन्तु प्रेम है, सहानुभूति है, समय है जो हम उन्हें दे सकते है. जब प्रसन्न होंगे बच्चे तो स्वाभाविक है पढ़ने में मन भी लगेगा. अब लगाइये अपनी स्ट्रेटेजी, कंटेंट नॉलेज, TLM अब परिणाम अच्छे मिलेंगे.क्यूँ की वो अब इसलिए सुनेगा क्यूंकि आप उसे सुनते हैं. दोस्ती अच्छी रखनी है उसे आपसे तो काम भी करेगा, सीखेगा भी. जब तक कोई स्वयं सीखने को तैयार नहीं है उसे सिखाया नहीं जा सकता.(Thorndike's-law of readiness)और सीखने को बच्चों का मन तभी तैयार होगा जब वह मानसिक रूप से प्रसन्न होंगे




लड़कियों, प्लीज ये पढ़ो. सजग रहो और सुरक्षित रहो



पिछले महीने की बात है. पोलाची केस के बारे में आपने पढ़ा होगा. तमिलनाडु में कोयंबटूर से 45 किलोमीटर दूर पोलाची में एक गैंग सक्रिय था, जो महिलाओं से फेसबुक पर फ्रेंडशिप करता था, उनका भरोसा हासिल करता था, उनसे अंतरंग बातें करता था और फिर उन्हें ब्लैकमेल करता था. उसका शिकार हुए लोगों में जवान लड़कियों से लेकर उम्रदराज औरतें तक शामिल थीं.
11 मार्च को एक वेबसाइट पर एक वीडियो पब्लिश हुआ. ब्लर किए हुए उस वीडियो में एक महिला रोते-चीखते लड़कों से गुजारिश कर रही थी कि मुझे नुकसान मत पहुंचाओ. ये उसी पोलाची गैंग का वीडियो था. ये लोग इस हद तक महिलाओं का भरोसा जीत लेते थे कि वो उनसे निजी तौर पर मिलने को भी तैयार हो जाती थीं, अंतरंगता भी होती, रिश्ते भी बनते. बस वो लड़कियां ये नहीं जानती थीं कि उनका वीडियो बनाया जा रहा है. उनकी निजता, सुरक्षा सब कुछ दांव पर है. जिसे वो दोस्ती, प्यार, कैजुअल सेक्स, जो भी समझ बैठी हैं, वो फरेब की ऐसी खाई है, जिसमें गिरेंगी तो अकेले मरेंगी.
आज एक महीने बाद उस घटना का जिक्र अचानक क्यों मौजूं हो गया? क्योंकि परसों रात मेरे इनबॉक्स में एक मैसेज आया. एक लड़की ने अपनी कहानी सुनाई कि कैसे फेसबुक पर एक लड़के से उसकी दोस्ती हुई. दोस्ती लंबी चैटिंग में और चैटिंग प्यार में बदल गई. अभी तक सब वर्चुअल ही था. लेकिन प्यार था तो संकोच की दीवारें एक-एक कर गिरने लगीं. मोबाइल नंबर शेयर हुए और व्हॉट्सएप पर इंटीमेट बातें हुईं. लड़की ने ठीक-ठीक ये शब्द नहीं कहा, लेकिन बात दरअसल सेक्स चैटिंग की थी. लड़की की निजी फंतासियां, उसके सुख के अरमान, देह की कामनाएं, सब शब्द बनकर वर्चुअल स्पेस में चले गए. दूसरी ओर एक आदमी था, जो सब कुछ जमा कर रहा था, लड़की के सपनों का बहीखाता बना रहा था. जैसे बहुत सी दोस्तियों और मुहब्बत की उम्र बहुत लंबी नहीं होती, इस दोस्ती की भी नहीं रही. लड़का अब किसी और लड़की से ऐसे ही वर्चुअल प्रेम की पींगें बढ़ा रहा था और ये लड़की छटपटा रही थी. जो उसने इस पर रोना-बिफरना चाहा, लड़के को लानतें भेजना तो एक ऐसा विस्फोट हुआ कि प्रेम के दुख की जगह डर ने ले ली. लड़के ने कहा था कि उसकी सारी इंटीमेट चैट और तस्वीरें उसके पास सुरक्षित हैं और कभी भी सार्वजनिक की जा सकती हैं. इसलिए बेहतर होगा कि वो चुपचाप उसकी जिंदगी से चली जाए. लड़की ने दोहरी मार खाई थी. उसका दिल भी टूटा था और भरोसा भी.
पोलाची गैंग के मर्दों ने एक साथ सैकड़ों लड़कियों को निशाना बनाया था. वो अब तक बेधड़क ये करते आ रहे थे. लड़कियां बदनामी के डर से चुप थीं. उनमें से कोई एक साहसी निकली, जिसके परिवार ने भी दोष उसके मत्थे नहीं मढ़ा, उसका साथ दिया तो ये गैंग पकड़ा गया.
लेकिन क्या हम नहीं जानते है कि हमारे आसपास, हमारे घरों, दफ्तरों, बिल्डिंग और कॉलोनी में ऐसे कितने नकाबपोश छिपे हुए हैं? और कितनी ऐसी नासमझ लड़कियां, जो रोज जाने-अनजाने फरेब की खाई में गिर रही हैं.
लड़के भरोसे के लायक क्यों नहीं हैं? उन्हें कैसा होना चाहिए? समाज को कैसा होना चाहिए? फिलहाल ये सब मेरी चिंता का सवाल नहीं.

मेरी चिंता का सवाल हैं वो लड़कियां, जिनके हाथों में इस वक्त डेटा कार्ड वाला स्मार्ट फोन है, दिल में प्यार के सपने हैं, देह में सुख के अरमान और अनुभवों का बक्सा खाली. बात समझने और समझाने वाले परिपक्व दोस्त की जगह खाली. हाथ पकड़ने, राह दिखाने वाले टीचर की जगह खाली. बेटी को भरोसा देने और उस पर भरोसा करने वाले परिवार की जगह खाली.
ऐसे में क्या करेंगी ये लड़कियां? कोई मिलेगा फेसबुक पर, मीठी-मीठी बातें करेगा, वो उसे दोस्त समझ लेंगी? उस पर भरोसा कर लेंगी? आखिर दिल्ली की उस पत्रकार महिला ने भी तो उस मर्द साथी पर भरोसा ही किया था, जिसने उसका सेक्‍स वीडियो बनाकर सारे ऑफिस के लोगों को भेज दिया था. इस शहर दिल्ली में ऐसा कोई पत्रकार नहीं, जिसने वो वीडियो न देखा हो. जस्सी फेम मोना सिंह ने भी तो अपने ब्वॉयफ्रेंड पर भरोसा ही किया था, जिसने उसका न्यूड वीडियो पब्लिक कर दिया था. और डीपीएस की वो लड़की, जो देश भर के पत्रकारों के लिए देश के पहले एमएमएस स्कैंडल की स्टोरी बन गई थी. और छोटे शहरों-कस्‍बों की वो सैकड़ों लड़कियां, जिनके बारे में रोज ऐसी खबरें छपती हैं कि “अश्‍लील वीडियो वायरल होने पर लड़की ने की आत्‍महत्‍या.”
जब मैं कॉलेज में थी तो इलाहाबाद में हमारे मुहल्ले की एक लड़की की उसके ब्वॉयफ्रेंड ने ब्लू फिल्म बनाकर इंटरनेट पर डाल दी थी. उनका परिवार रातोंरात वो मुहल्ला और शहर छोड़कर चला गया. आज भी कई बार मुझे उसका खयाल आता है. वो कहां होगी? और आज भी वो लड़का उसी मुहल्ले में छाती चौड़ी कर घूमता है और सड़क पर खड़े होकर पेशाब करता है. लड़की को फिर किसी ने कभी नहीं देखा.
और जरूरी नहीं कि तुम्हारी अंतरंग चीजें हर लड़का इंटरनेट पर ही डालता फिरे. कई बार वो ये सब सिर्फ अपने दोस्तों और सहकर्मियों को भी दिखा रहा होता है, अपनी उपलब्धि की तरह.
इसलिए मेरी चिंता ये नहीं कि लड़कों का क्या? मेरी चिंता है कि लड़कियों का क्या? कुछ बातें हैं, जो कम उम्र की नौजवान लड़कियों से कहना चाहती हूं. शायद तुम इन बातों पर गौर करना चाहो -:
1. अजनबियों से बात करने में कोई बुराई नहीं है. आज जो तुम्हारा अच्छा दोस्त है, वो भी कभी अजनबी रहा होगा. ऐसे ही मिलते हैं अजनबी जिंदगी में और फिर अपने हो जाते हैं. लेकिन वर्चुअल स्पेस के अजनबियों से थोड़ा सावधान. जो सीधे इनबॉक्स में फ्रेंडशिप वाला गुलाब भेज दे, सीधे नंबर मांग ले या बात की शुरुआत ही यूं करे कि “आपकी आंखें बड़ी खूबसूरत हैं” तो यकीन मानो या तो वो महाजाहिल है या महामक्कार. और दोनों ही किस्म के लोग दोस्ती के लायक नहीं.
2. कुछ ऐसे भी होते हैं, जो गरिमा से बात करते हैं, आदर से पेश आते हैं. जो अच्छे भी लग सकते हैं और जिनसे प्यार भी हो सकता है. और जब कोई अच्छा लगने लगे तो उसकी हर बेजा मांग के सामने भी लड़कियां सिर झुका देती हैं. लेकिन याद रखो, जिसने किसी भी किस्म की गलत मांग की, वो इंसान भरोसे के लायक नहीं. सेक्स चैट की या न्यूड फोटो मांगी, उस पर भरोसा मत करना.
3. कुछ चीजें ऐसी हैं, जो कभी भी, किसी के भी साथ, किसी भी हाल में नहीं करनी चाहिए. जैसे अपनी न्यूड तस्वीरें भेजना या सेक्स चैट करना. अगर वो लड़का इतना करीबी है कि पूरा परिवार भी उसे जानता है, तुम्हें लगता है कि उससे कभी कोई खतरा नहीं हो सकता, तो भी नहीं. किसी से भी नहीं. उससे भी नहीं, जिससे शादी तय हुई हो या शादी हो चुकी हो. किसी से, किसी हाल में नहीं.
4. इंसान अगर भरोसे वाला हो तो भी वर्चुअल स्पेस भरोसे वाला नहीं है. यहां कोई चीज डिलिट नहीं होती और न कुछ भी पर्सनल होता है. तुम्हारी पर्सनल मेल से लेकर व्हॉट्सएप तक सब कुछ एक्सेस किया जा सकता है. फर्ज करो, तुम्हारा फोन या लैपटॉप खराब ही हो जाए. तो उसे ठीक करने वाले के हाथ वो सारी निजी चीजें लग सकती हैं. इंटरनेट की अंधेरी दुनिया में कौन, कहां, कब, क्या डाल दे, कर दे, कोई भरोसा नहीं. इसलिए ऐसी कोई वलनरेबल चीज न फोन पर रखनी चाहिए और न ही कभी किसी को भेजनी चाहिए.
5. स्काइप, फेसटाइम, व्हॉट्सएप या किसी भी तरह के वीडियो चैट पर कोई न्यूडिटी नहीं. लाख डिमांड पर भी नहीं. वो स्पेस भी उतना ही खतरनाक है.
6. याद रखो, ये जितनी भी बातें हैं, जो तुमसे सचमुच प्यार करता है, जो सचमुच तुम्हारा दोस्त है, वो इन सावधानियों के प्रति पहले से हजार गुना सावधान होगा. जो प्यार करेगा, वो कभी नहीं करेगा ऐसी कोई बेजा मांग.
7. और सबसे आखिर में सबसे जरूरी बात. आखिर हम फिसलते ही क्यों हैं? हम क्यों फंसते हैं इस जाल में? बात सिर्फ इतनी नहीं है कि अनुभव कम है, भरोसा कर बैठे. उस उम्र में हम भरोसा इस कदर करते हैं और ऐसे कि मानो भरोसा करने के लिए ही बैठे थे. इसमें गलती नहीं है तुम्हारी. उस उम्र का, उस इच्छा का आवेग ही कुछ ऐसा होता है. जितने बल से मां की देह चीरकर बच्चा आता है संसार में, वैसे ही बल से आती हैं देह की कामनाएं, जब उम्र आती है. ये दुर्घटनाएं बार-बार इतने रूपों में, इतने बड़े पैमाने पर और इतनी सारी लड़कियों के साथ इसीलिए होती हैं कि कामना के उस बल के आगे, देह और मन की उस बेचैनी के आगे बुद्धि, विवेक, दुनियादारी का डर सब हथियार डाल देते हैं.
इसलिए अगर हम देह और मन की उस बेचैनी को उससे थोड़ा परे हटकर देख पाएं, समझ पाएं, किसी से बात कर पाएं तो सुख के साथ सुख के खतरे को भी समझेंगे, सुख की जिम्मेदारी को भी समझेंगे, सुख की गरिमा को भी समझेंगे.
हम सही चुनेंगे, हम ईमानदार चुनेंगे.


मनीषा पाण्डेय

Sunday, April 14, 2019

बिब्लियोथेक नेशनल, पेरिस



बिब्लियोथेक नेशनल, पेरिस
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मैं यहां बैठा हूं और एक कवि* को पढ़ रहा हूं।

यहां बहुत सारे लोग हैं, लेकिन मुझे तो जैसे किसी की ख़बर ही नहीं। वे भी अपनी किताबों में खोए हैं। कभी-कभी वे किताबों के पन्ने यों उलटते, जैसे नींद में डूबा कोई व्यक्ति दो स्वप्नों के बीच करवट बदलता हो।

आह, किताब पढ़ रहे लोगों के बीच होना कितना सुंदर है! वे हमेशा ऐसे क्यों नहीं होते? आप चाहें तो उनके पास जाकर उन्हें हल्के-से छू भी सकते हैं और उन्हें पता भी ना चलेगा। और अगर आप अपनी कुर्सी से उठते समय समीप बैठे किसी व्यक्ति से टकरा गए, और आपने इसके लिए माफ़ी मांगी, तो वो आपकी तरफ़ देखे बिना केवल उस दिशा में सिर भर हिला देगा, जहां से क्षमायाचना की आवाज़ आई थी। और उसके बाल वैसे मालूम होंगे, जैसे कोई अभी-अभी नींद से उठा हो। ये सब कितना अच्छा है!
और मैं यहां बैठा हूं और एक कवि को पढ़ रहा हूं। कैसा सौभाग्य! अभी यहां कोई तीन सौ लोग होंगे, और सभी कुछ ना कुछ पढ़ रहे हैं, लेकिन सभी किसी कवि को थोड़ ना पढ़ रहे होंगे। दुनिया में तीन सौ कवि ही कहां हैं? ईश्वर ही जानता है, कि वे इतने मन से किस चीज़ में डूबे हैं। किंतु मेरे सौभाग्य पर विचार कीजिए कि मैं, जो शायद इन सभी लोगों में सबसे दयनीय हूं, और दूसरे देश से आया हूं, यहां बैठा हूं और एक कवि को पढ़ रहा हूं। तो क्या हुआ, अगर मैं निर्धन हूं और मेरा सूट इतना अच्छा नहीं, अलबत्ता मेरी कमीज़ की कॉलर ज़रूर साफ़ है। लेकिन अभी मैं इन किताबों के साथ हूं, सभी से इतना दूर, जैसे कि मैं मर चुका हूं। और मैं एक कवि को पढ़ रहा हूं!
आपको पता भी है, कवि क्या होता है? वर्लेन का नाम सुना है? शायद आपके लिए उसका नाम कोई मायने नहीं रखता होगा। लेकिन मैं वर्लेन को नहीं पढ़ रहा हूं। मैं किसी और कवि को पढ़ रहा हूं, जो पेरिस में नहीं रहता। जिसका घर पहाड़ों पर है और जिसकी आवाज़ साफ़ हवा में बजती घंटियों सरीखी है। जिसको कि कहते हैं- "ख़ुशख़त!" वैसा ही एक कवि, जो घर की खिड़कियों और किताबघर के शीशों के बारे में बतलाता है। जो एकान्त से भरी दूरियों पर गहराई से सोचता है। मैं उस जैसी ही कविताएं लिखना चाहता हूं, लेकिन अभी तो मेरे सिर पर छत भी नहीं है और मेरी काठ की मेज़ें खलिहानों में रखी सड़ रही हैं।
कभी-कभी मैं र्यू-दे-सीन की छोटी दुकानों में चला जाता हूं। वो होती हैं ना क़ीमती गुलदानों या पुरानी किताबों की दुकानें। पूरा-पूरा दिन इन दुकानों में कोई झाँकने तक नहीं आता, लेकिन उनमें देखने पर आप पाते हैं कि दुकान-मालिक को जैसे इसकी परवाह ही नहीं, वे चुपचाप बैठे पढ़ते रहते और उनके पैरों के नीचे उनका कुत्ता सुस्ताता रहता। तब कभी-कभी मैं यह भी सोचता हूं कि भरे बाज़ार में वैसी एक दुकान ख़रीद लूं और उसकी शीशे की दीवारों के पीछे बीस साल तक चुपचाप, अकेला बैठा रहूं!
~ रिल्के
[ "द नोटबुक्स ऑफ़ माल्ते लॉरिड्ज़ ब्रिग्गे" ]

Friday, March 1, 2019

हृदयाघात


पड़ोस में एक सज्जन को तीन घण्टे पहले सीने में दर्द उठा। कुछ घबराहट भी थी। धर्मपत्नी संग ही थीं। 325 मिग्रा की एस्पिरिन और सॉर्बिट्रेट एक गिलास पानी के साथ ले आयीं। सज्जन को दवाएँ खिला दी गयीं। तब तक लोग उन्हें मेडिकल कॉलेज लेकर भागे। वहाँ जाकर मायोकार्डियल इन्फार्क्शन की पुष्टि हुई।
जिस दर से समाज में हृदयरोग बढ़ रहे हैं , उसके अनुसार चबायी जाने वाली एस्पिरिन और सॉर्बिट्रेट का घर में रखा जाना कोई अतिवादी क़दम नहीं। अब हम इस धोखे में नहीं जी सकते कि हृदयाघात पैंसठ साल के आदमी को होगा या केवल डायबिटीज़ के रोगी को अपना शिकार बनाएगा। जब पच्चीस-तीस साल के लड़के सीने में दर्द के कारण भर्ती हो रहे हैं और उनमें हृदयाघात की पुष्टि हो रही है , तो ऐसे में लापरवाही उचित नहीं होगी।

एस्पिरिन का चबाया जाने वाला यह स्वरूप अगर सीने में दर्द के तुरन्त बाद दे दिया जाए , तो हृदय की मांसपेशियों की क्षति को कम कर देता है। ध्यान रहे कि यह एस्पिरिन वह एंटेरिक कोटेड एस्पिरिन नहीं है , जिसे डॉक्टर हृदयाघात की रोकथाम के लिए लिखते हैं। वह गोली चबायी नहीं जाती , निगली जाती है। यहाँ गोली को चबाना है ताकि वह ख़ून में जल्दी पहुँचे और काम शुरू कर दे। जब सीने में दर्द उठ ही चुका है , तो रोकथाम का प्रश्न नहीं उठता। तब पहले प्राथमिक उपचार के बाद सीधे ऐसे अस्पताल भागना है , जहाँ हृदयरोग-विशेषज्ञ मौजूद हैं।

सज्जन के परिवार वाले समझदार हैं। उनकी पत्नी की जितनी प्रशंसा की जाए , कम होगी। वे स्वयं डायबिटीज़ से ग्रस्त हैं। लेकिन घर में उनकी डायबिटीज़ की दवाओं के अलावा एक ग्लूकोमीटर , एक ग्लूकोज़ का डिब्बा , चबायी जाने वाले एस्पिरिन , सॉर्बिट्रेट , एसिडिटी-नाशक गोलियाँ और ब्लड-प्रेशर-यन्त्र हमेशा उपलब्ध रहते हैं। ये लोग कभी इन संसाधनों के बिना कहीं यात्रा नहीं करते। मुसीबत स्थान देखकर नहीं आती। वह कहीं भी बिना चेताये प्रकट हो सकती है।

चबायी जाने वाली एस्पिरिन किन्हें न दी जाए --- यह सवाल महत्त्वपूर्ण है। अधिकांश लोग इन गोलियों को सीने में उठे दर्द के लिए खा सकते हैं। हृदयाघात की आशंका-भर इसके सेवन के लिए काफ़ी है। कारण कि इस दवा से होने वाले लाभ की तुलना में हानि नगण्य है। हाँ , लेकिन अगर रोगी के पेट में अल्सर हो , अथवा ख़ून पतला करने की कोई दवाएँ चल रही हों या फिर एस्पिरिन के प्रति हायपरसेंसिटिविटी के लक्षण रहे हों , तब ऐसे लोगों को ये गोलियाँ नहीं खानी चाहिए।

ज़ाहिर हैं , इस तरह के अपवाद समाज में कम ही हैं। और ऐसे में चबायी जाने वाली एस्पिरिन सीने में उठे दर्द के लिए प्राथमिक उपचार बनकर उभरती है।

क्या आपके घर में चबायी जाने वाली एस्पिरिन 325 मिग्रा है ? सॉर्बिट्रेट ? अगर नहीं हैं , तो निकटतम मेडिकल-स्टोर घर से कितनी दूर है ? निकटतम अस्पताल जहाँ हृदयरोग के लिए कैथलैब उपलब्ध हो , वह कितनी दूर है ? क्या आपने कभी इन सब सवालों पर ग़ौर किया है ?

इस विषय में अपने डॉक्टर से अवश्य चर्चा कीजिए। यह वह प्राथमिक क़दम है , जो हम-सब हृदय-रोगों के विरुद्ध उठा सकते हैं।


- डॉ.स्कंद शुक्ल

Sunday, February 24, 2019

जलियाँवाला बाग में बसंत


यहाँ कोकिला नहीं, काग हैं, शोर मचाते, 

काले काले कीट, भ्रमर का भ्रम उपजाते।

कलियाँ भी अधखिली, मिली हैं कंटक-कुल से,
वे पौधे, व पुष्प शुष्क हैं अथवा झुलसे।

परिमल-हीन पराग दाग सा बना पड़ा है,
हा! यह प्यारा बाग खून से सना पड़ा है।

ओ, प्रिय ऋतुराज! किन्तु धीरे से आना,
यह है शोक-स्थान यहाँ मत शोर मचाना।

वायु चले, पर मंद चाल से उसे चलाना,
दुःख की आहें संग उड़ा कर मत ले जाना।

कोकिल गावें, किन्तु राग रोने का गावें,
भ्रमर करें गुंजार कष्ट की कथा सुनावें।

लाना संग में पुष्प, न हों वे अधिक सजीले,
तो सुगंध भी मंद, ओस से कुछ कुछ गीले।

किन्तु न तुम उपहार भाव आ कर दिखलाना,
स्मृति में पूजा हेतु यहाँ थोड़े बिखराना।

कोमल बालक मरे यहाँ गोली खा कर,
कलियाँ उनके लिये गिराना थोड़ी ला कर।

आशाओं से भरे हृदय भी छिन्न हुए हैं,
अपने प्रिय परिवार देश से भिन्न हुए हैं।

कुछ कलियाँ अधखिली यहाँ इसलिए चढ़ाना,
कर के उनकी याद अश्रु के ओस बहाना।

तड़प तड़प कर वृद्ध मरे हैं गोली खा कर,
शुष्क पुष्प कुछ वहाँ गिरा देना तुम जा कर।

यह सब करना, किन्तु यहाँ मत शोर मचाना,
यह है शोक-स्थान बहुत धीरे से आना।

- सुभद्रा कुमारी चौहान

Pulwama terror attack 2019